नई दिल्ली:फिल्म इंडस्ट्री में जहां ज्यादातर निर्देशक वर्षों तक असिस्टेंट डायरेक्टर, लेखक या किसी अन्य फिल्मी भूमिका से शुरुआत करते हैं, वहीं राधिका बंसल ने निर्देशन की दुनिया में एक बिल्कुल अलग रास्ते से कदम रखा है। गोल्डमैन सैक्स और हार्वर्ड बिजनेस पब्लिशिंग जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों में काम करने के बाद राधिका ने कॉरपोरेट दुनिया को पीछे छोड़कर कहानी कहने की अपनी नई यात्रा शुरू की। अब वह अपनी पहली फीचर फिल्म के साथ बतौर लेखक-निर्देशक दर्शकों के सामने आने के लिए तैयार हैं।
राधिका का पेशेवर सफर भारत से लेकर हांगकांग और लंदन तक फैला रहा है। कॉरपोरेट क्षेत्र में एक सफल करियर के बाद उन्होंने अपने बच्चों की परवरिश के लिए काम से ब्रेक लिया। यही वह दौर था जब उनकी जिंदगी में लेखन ने दस्तक दी।
शुरुआत में राधिका ने अपने अनुभवों को डायरी में दर्ज करने की कोशिश की। लेकिन खुद के बारे में सीधे लिखना उन्हें सहज नहीं लगा। ऐसे में उन्होंने अपने अनुभवों को काल्पनिक किरदारों और कहानियों में ढालना शुरू किया। धीरे-धीरे यही लेखन स्क्रीनप्ले में बदल गया और उनकी पहली पटकथा तैयार हुई।
उनकी पहली पटकथा एक लीगल ड्रामा थी, जिसने बड़े स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। हालांकि यह प्रोजेक्ट आखिरकार ग्रीनलाइट नहीं हो सका, लेकिन इस अनुभव ने राधिका को एक महत्वपूर्ण चीज दी—यह विश्वास कि वह कहानी कहने की दुनिया में अपनी जगह बना सकती हैं।
अब वही आत्मविश्वास उन्हें बतौर निर्देशक उनकी पहली फीचर फिल्म तक लेकर आया है। खास बात यह है कि राधिका ने इस फिल्म को सिर्फ लिखा ही नहीं, बल्कि इसके निर्देशन की जिम्मेदारी भी खुद संभाली है। उन्होंने प्रोजेक्ट को शुरुआत से तैयार किया, अपनी क्रिएटिव टीम बनाई, कलाकारों का चयन किया और फिल्म की पूरी रचनात्मक दिशा तय की।
राधिका की पहली फिल्म एक समकालीन फैमिली ड्रामा है। लेकिन इस फिल्म की खासियत सिर्फ इसकी कहानी नहीं, बल्कि परिवार और रिश्तों को देखने का उनका नजरिया भी है।
आज के दौर में कई फैमिली ड्रामा फिल्मों और सीरीज में रिश्तों के तनाव, टूटन, असंतोष और अंधेरे पहलुओं को केंद्र में रखा जाता है। राधिका ने इससे अलग रास्ता चुना है। उनका उद्देश्य परिवार की गर्माहट को दिखाना है, लेकिन बिना जरूरत से ज्यादा भावुक हुए; हास्य को शामिल करना है, लेकिन उसे फूहड़ या अतिरंजित बनाए बिना; और भावनाओं को गहराई देना है, लेकिन कहानी को निराशा से भरने के बजाय उम्मीद और जुड़ाव के साथ पेश करना है।
उनकी कोशिश ऐसी फिल्म बनाने की रही है जिसे परिवार के अलग-अलग आयु वर्ग के लोग एक साथ बैठकर देख सकें। ऐसे समय में जब डिजिटल कंटेंट देखने का अनुभव अक्सर व्यक्तिगत और अकेलेपन से जुड़ा हो गया है, राधिका की फिल्म सामूहिक रूप से फिल्म देखने की उस पुरानी संस्कृति को फिर से याद दिलाने की कोशिश करती है।
राधिका की कहानी इस मायने में भी दिलचस्प है कि फिल्म निर्माण की दुनिया में आने की शुरुआत उन्होंने किसी फिल्म स्कूल या फिल्म सेट से नहीं की। उनके लिए कहानी कहना निजी अनुभवों को समझने का एक माध्यम बना और वही धीरे-धीरे उनका पेशा बन गया।
अपने अनुभवों को सीधे लिखने के बजाय उन्हें काल्पनिक रूप देने की प्रक्रिया ने उन्हें एक लेखक के तौर पर अपनी आवाज खोजने में मदद की। पहली पटकथा के अनुभव ने उन्हें यह भरोसा दिया कि उनकी कहानियां बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंच सकती हैं।
इसके बाद उन्होंने सिर्फ किसी दूसरे निर्देशक के आने का इंतजार नहीं किया। उन्होंने खुद निर्देशक की कुर्सी संभालने का फैसला किया और अपनी पहली फीचर फिल्म को जमीन से खड़ा किया।
राधिका बंसल की यह आगामी फैमिली ड्रामा फिल्म 2026 के फेस्टिव सीजन में OTT पर रिलीज होने वाली है। फिल्म की रिलीज का समय भी इसकी थीम से गहराई से जुड़ा हुआ नजर आता है। दिवाली और त्योहारी मौसम परिवार, साथ और रिश्तों को सेलिब्रेट करने के लिए जाना जाता है और राधिका की फिल्म भी इन्हीं भावनाओं को केंद्र में रखती है।
बतौर पहली बार निर्देशक राधिका के लिए यह प्रोजेक्ट सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि उनके जीवन के एक बिल्कुल नए अध्याय की शुरुआत है। कॉरपोरेट बोर्डरूम से लेकर फिल्म के सेट तक का उनका सफर यह दिखाता है कि रचनात्मक पहचान बनाने के लिए जरूरी नहीं कि शुरुआत फिल्म इंडस्ट्री से ही हो।
राधिका बंसल की कहानी उन लोगों के लिए भी प्रेरणा है जो जिंदगी के किसी पड़ाव पर अपने भीतर छिपी रचनात्मक आवाज को पहचानते हैं और फिर उसे अपनी नई राह बनाने का साहस करते हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि कॉरपोरेट दुनिया से निकलकर सिनेमा में आई यह नई आवाज दर्शकों के बीच कितनी गहरी छाप छोड़ती है।

